Imam Hasan Ka Dastarkhan in Hindi- हजरत इमाम हसन की कहानी

Imam Hasan Ka Dastarkhan in Hindi इमाम हसन की नज़्र (दस्तरखान कब होता है ):

Imam Hasan Ka Dastarkhan हरा होता है और 22 जमादिल-सानी के बाद मग़रिब की नमाज़ के बाद इमाम हसन की नज़्र कराया जाता है खुद भी खाए और लोगो को भी खिलाए।

Imam Hasan Ka Dastarkhan

Imam Hasan Ka Dastarkhan नज़र का तरीका in Hindi

सात – सात बर्तनों में दो जगह, एक पाक जगह पर रखा जाता है और चौदह पूरियां पकाई जाती हैं, और उसके साथ बकरे का गोश्त रखा जाता है, मन्नत मानने के बाद दुआ मांगें, और फिर यह हदीस पढ़ें। हदीसों से मिलता है कि जब किसी इंसान पर कोई परेशानी आती है तो यह सबसे बेहतरीन नज़र है। उसके बाद, मुहम्मद व आले मुहम्मद पर दुरूद भेजे।

Imam Hasan Ka Dastarkhan की कहानी

एक बार इमाम हुसैन बीमार पड़ गये। अमीरुल मोमिनीन ने तीन रोजे रखे। हसनैन को भी पता चला तो आपने भी तीन रोज़ा की मन्नत मांगी।फ़िज़्ज़ा जो इस घर की कनीज़ थी तीन दिन की मन्नत मानी। जब बच्चे ठीक हो गए और शहजादों ने गुसल कर लिया तो इरादा मन्नत पूरी करने की नियत कर ली लेकिन इफ्तार का कोई इंतजाम नहीं था। आख़िरकार अमीरुल मोमिनीन यहूदी के घर आये। देखा कि शिमोन रेशम साफ़ कर रहा था.फ़रमाया, हे शिमोन! इस रेशम में से कुछ मुझे दे दो ताकि पैग़म्बर की बेटी इसमें काम कर सके और उसकी मज़दूरी तीन सेर जौ होगी। अमीरुल मोमिनीन उसे घर ले गये। दुख्तारे रसूल ने तीन हिस्सों में बंटे। एक भाग रेशम का साफ किया गया और एक भाग को पीसा गया। शाम होते ही पांच रोटियां पकाए और एक सेर भर पानी और एक रोटी सामने राखी गई . यह अहल अल-बैत के इफ्तार का सामान था। अमीरुल मोमिनीन ने रोटी का पहला टुकड़ा तोड़ा और खाने का इरादा किया की एक गरीब मोहताज ने जंजीर हिलाकर आवाज दी. नबी के घर वालो , सलाम क़ुबूल करो मैं गिरोहे मुस्लमान में से हु और फ़क़ीर हु मुझे खाना खिलाओ, खुदा तुम्हे जन्नत के खाने से सेराब करेगा।

यह आवाज़ सुनकर सबने अपनी रोटी उसे दे दी। यहाँ तक कि कनीज़ फ़िज़्ज़ा ने भी अपना हिस्सा दे दिया और सभी ने खाली पानी से इफ्तार किया. दूसरे दिन, जनाबे फातिमा ने रेशम के दूसरे हिस्से को साफ किया और उसी तरह से पांच रोटियां पकाईं। ईफ्तार करना ही चाहते थे की एक यतीम की आवाज ने उन रेहम दिलो को मजबूर किया और सबने अपनी अपनी रोटी इस यतीम को दे दिया। तीसरे दिन की नियत करके सब सो रहे थे।

तीसरे दिन,सुबह रसूल की बेटी ने बचे हुए रेशम को साफ़ किया और जौ को पीस लिया और पाँच रोटियाँ पकायीं। आज भी एक असीर ने आवाज उठाई. ऐ अहले बैत रसूल! मैं एक मुस्लिम कैदी हूं. कफ़्फ़ार के बस में हूं. वे मुझे खाना नहीं देते. फातिमा ने अली के चेहरे की तरफ देखा. अली फातिमा की तरफ देखने लगे.

आख़िरकार सबने अपनी अपनी रोटी इस कैदी को दे दी और यह तीसरा रोज़ा भी पानी से तोड़ा गया। उन्होंने लगातार तीन दिनों तक सिर्फ पानी पीकर अपना रोज़ा तोड़ा। ज़रा दिल वाले अंदाज़ा करे गर्मियों के दिन, ज़ोफ़ से सबकी हालत ख़राब थी, ख़ुसूसन
इमाम हुसैन जो अभी बीमारी से उठे थे जूफ से इस तरहा लरज़े थे जैसे परिंदे के बच्चे कांपते है। दोनों बच्चे अमीरुल मोमिनीन के साथ रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की मस्जिद में गए।

नाना ने नवासे की जो हालत देखी नाना हताशबेताब हो गए। वह घर आए.देखा कि मासूमए कौनैन मिहराब इबादत में इस तरह बैठी थी कि उसकी कमर झुकी हुई थी और आँखों में हल्का पड़ा हुआ है। क्यों न हो, बाप का दिल था , हाथ जनीबे आसमान की तरफ उठाये। मेरे माबूद ! मेरे एहलेबैत फाको से मर जायेगे।

इधर जिब्राइल एक तबक लाए आसमान से नाज़िल हुए। इस तबक में तामै जन्नत भरा हुआ था जिससे मश्क की खुशबू आ रही थी. तबक लाकर अमीरुल मोमिनीन के सामने रखी और सूरेह हल अता शुरू से लेकर आखिर तक पढ़ना शुरू किया ,जो अहले बैत की शान में है। अहले -बैत ने खुश होकर वो तामे जन्नत खा लिया। तीन दिनों तक रोज़ा पर रोज़ा रखना और पानी से इफ्तार करना सिर्फ एहलेबैत रसूल ही का काम था. यह नज़र नियाज़ की शान है.

Imam Hasan Ka Dastarkhan ka वाकिया:

इमाम हसन अ.स का दस्तरख़ान (Imam Hasan ka Dastarkhan) बहुत मशहूर है अगर किसी के रिस्क में तंगी हो वो नज़र करले कि मैं इमाम ए हसन का दस्तरख़ान करवाऊगा तो उसके रिस्क में इज़ाफ़ा होता है. आपका दस्तरखान पुरे दुनिया में मशहूर है.

एक ऐसी सिफ़त है जो सिर्फ इमाम हसन मुजतबा मे है वो है सखावत आपका कई लक़ब है जिसमे से एक लक़ब है करीम एहलेबैत

इस्लाम में 4 सिफ़त बयान की है-

1.लईम यानि मैं खाऊ या नहीं खाऊ दूसरा न खाए।
2. बख़ील वो है जो चाहता है की कोई कुछ न खाए बस मैं खाऊ
3. सख़ी वो है जो चाहता है की मैं खाऊ और दूसरा भी खाए
4 करीम वो है जो खुद खाए या न खाए लेकिन दुसरे खाते रहे
और करीम एहलेबैत हसन ए मुज्तबा है. अल्लाह ने रसूले खुदा को करीम कहा, अली मुर्तज़ा को करीम कहा, और 14 में जो सबसे करीम है वो हसन ए मुज्तबा है

एक वाक़ेया मिलता है की माविया को एक ही चीज़ पे ताज्जुब होता था वो यही सोचता रहता था की हमने फदक छीन लिया, हमने हुकूमत छीन लिया लेकिन जब मैं मदीने अता हु तब मुझे यहाँ इमाम हसन मुज्तबा का दस्तरखान सजा हुआ मिलता है , यहाँ सैकड़ो के तादात में लोग दस्तरखान पे बैठे रहते है। एक बार आपके दस्तरखान पे एक फ़क़ीर खाना खा रहा था खाना कहते कहते साथ ही साथ अपने सामान में खाना रखता जाता था.

  • मौला ने कहा की तो परेशां क्यों है ? आराम से खा!
  • इसने कहा की मैंने करीब में एक आदमी को देखा वो खुश्क रोटी खा रहा था। मैं उसके पास से ही आपके पास आया हु।
    मैंने सोचा की जब उसने भेजा है तो उसके लिए भी कुछ ले जाऊ।
  • मौला मुस्कुरा के पूछे ! कोई पहचान बता?
  • उसने कहा उसके पास से वैसे ही खुशबू आरही है जैसे आपके पास से आती है
  • मौला ने कहा क्या तू अभी भी नहीं समझा?
  • उसने कहा क्यां हि समझा?
  • मौला ने कहा यह दस्तरखान मेरा नहीं उन्ही का है
  • पूछा वो कोन है?
  • मौला ने कहा वो मेरे बाबा अली ए मुर्तुज़ा है.वही तो मुश्किल कुशा है।
  • कहा की इतना दस्तरखान होते हुए भी वो जौ की सुखी रोटी खा रहे थे
  • मौला ने कहा क्युकी वो करीम है दुनियाको खिलाते है। यह दस्तरखान भी उन्ही का है जो मैं उनके नाम से चला रहा है

आप ने हमारी इस पोस्ट में (Imam Hasan Ka Dastarkhan) के बारे में जाना कि हजरत इमाम हसन का दस्तरखान क्या है ? और इसे क्यों मनाया जाता है ? उम्मीद है की आपको ये आर्टिकल हजरत इमाम हसन की कहानी) से फायदा पहुंचेगा। इस आर्टिकल से रिलेटेड कोई भी सवाल आपके मन में हो आप पूछ सकते है.

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